सुरक्षित यात्रा के लिए सख्त प्रवर्तन की जरूरत, उत्तराखंड में बिना हेलमेट सवारी करने वालों पर शिकंजा और बढ़ा

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देहरादून। उत्तराखंड में बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं ने परिवहन विभाग की चिंता और चुनौती दोनों बढ़ा दी हैं। साल की शुरुआत से ही हादसों का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा। राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र के आंकड़ों के अनुसार 1 जनवरी से 20 फरवरी 2026 तक प्रदेश में 36 लोगों की जान जा चुकी है, 138 लोग घायल हुए हैं, जबकि तीन लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। सबसे अधिक मौतें देहरादून और पिथौरागढ़ जिलों में दर्ज की गई हैं। यह स्थिति तब है जब केंद्र और राज्य स्तर पर सड़क सुरक्षा माह चलाया गया और व्यापक जागरूकता अभियान भी संचालित हुए। भारत सरकार की ओर से 1 से 31 जनवरी तक सड़क सुरक्षा माह मनाया गया, जबकि राज्य में 16 जनवरी से 14 फरवरी तक विशेष अभियान चलाया गया। इसके बावजूद हादसों में कमी न आना गंभीर संकेत दे रहा है। मैदानी जिलों से लेकर पर्वतीय क्षेत्रों तक दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल अभियान पर्याप्त नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर सख्त प्रवर्तन और व्यवहार परिवर्तन की आवश्यकता है।

परिवहन विभाग के अनुसार ओवरस्पीडिंग सड़क दुर्घटनाओं का प्रमुख कारण बनकर उभरी है। पिछले एक दशक में सड़कों की स्थिति में सुधार और आधुनिक वाहनों की बढ़ती रफ्तार ने जोखिम भी बढ़ाया है। संयुक्त परिवहन आयुक्त राजीव कुमार मेहरा ने स्वीकार किया कि प्रवर्तन और जागरूकता के बावजूद अपेक्षित कमी नहीं आई है। उन्होंने बताया कि दुर्घटनाओं के वास्तविक कारणों को समझने के लिए वैज्ञानिक विश्लेषण की प्रक्रिया शुरू की गई है। देहरादून और हल्द्वानी में इसके लिए प्रशिक्षण भी कराया गया है। प्रदेश में 37 स्थानों पर लगे एएनपीआर (ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकगनाइजेशन) कैमरों के जरिए ट्रैफिक नियम तोड़ने वालों पर सख्ती की जा रही है। 1 अप्रैल 2025 से 20 फरवरी 2026 तक 5 लाख 19 हजार 498 चालान काटे जा चुके हैं। इनमें बिना हेलमेट वाहन चलाने पर 1.60 लाख से अधिक, पिछली सवारी के बिना हेलमेट पर 3.03 लाख से अधिक, ओवरस्पीडिंग पर 18 हजार 45, दोपहिया पर दो से अधिक सवारी पर 35 हजार 559 और गलत दिशा में वाहन चलाने पर 1545 चालान शामिल हैं। पिछले वित्तीय वर्षों की तुलना में ऑनलाइन चालान की संख्या में कई गुना वृद्धि हुई है, जो प्रवर्तन की सक्रियता दर्शाती है।

ब्लैक स्पॉट भी बड़ी चिंता का विषय बने हुए हैं। प्रदेश में 179 ब्लैक स्पॉट चिन्हित किए गए हैं, जिनमें से 155 पर सुधार कार्य हो चुका है, जबकि 24 स्थानों पर काम शेष है। पिछले तीन वर्षों में 46 ब्लैक स्पॉट ऐसे रहे जहां कोई दुर्घटना नहीं हुई, लेकिन 8 स्थान ऐसे हैं जहां 10 से अधिक दुर्घटनाएं दर्ज की गईं। निरीक्षण में यह भी सामने आया कि कई स्थानों पर लगाए गए क्रैश बैरियर को क्षतिग्रस्त कर अनधिकृत कट बना दिए गए हैं, जो हाईवे पर हादसों का बड़ा कारण बन रहे हैं। निर्माण एजेंसियों को ऐसे सभी कट बंद करने के निर्देश दिए गए हैं। पेयजल, शिक्षा और स्वास्थ्य की तरह सड़क सुरक्षा भी अब प्राथमिक मुद्दा बन चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि सख्त प्रवर्तन, सुरक्षित सड़क डिजाइन, ब्लैक स्पॉट सुधार और जनसहभागिता इन चार स्तंभों पर ही दुर्घटनाओं में कमी लाई जा सकती है। परिवहन विभाग को उम्मीद है कि तकनीक आधारित निगरानी, वैज्ञानिक विश्लेषण और निरंतर जागरूकता अभियानों से भविष्य में सकारात्मक परिणाम मिलेंगे। फिलहाल आंकड़े चेतावनी दे रहे हैं कि यदि ओवरस्पीडिंग और नियमों की अनदेखी पर लगाम नहीं लगी, तो सड़क सुरक्षा एक और गंभीर सामाजिक संकट का रूप ले सकती है। उत्तराखंड के पहाड़ी और मैदानी इलाकों में सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित करना अब केवल प्रशासन नहीं, बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी बन गई है।